अपना दुख तो दूर खड़ा है

उस के दुख का ये रुत्बा है

ख़ुशियों ने मेहनत तो बहुत की
रंज मगर अव्वल आया है

दोस्त तेरा ग़म अच्छा है तू
ग़म में मुझे अपना कहता है

अपना इश्क़ भरम है होगा
मुझ को भरम में ही जीना है

एक अँधेरे घर में हैं हम
जिस का दरीचा कुछ छोटा है

अपनी मोहब्बत के सहरा में
मैं प्यासा हूँ वो दरिया है

बर्क़ गिराई अब्र ने लेकिन
लोगों ने बस शोर सुना है

कैसे सफ़र पे जाने दूँ यार
जब मुझ को रस्ते का पता है

मुझ को बेचैनी होती है
बाक़ी सब बिल्कुल बढ़िया है

बस बर्बादी हाथ लगी है
और अना से क्या मिलता है

— Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'

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