चल अब दुनिया के जैसा सोचते हैं
उठ ऐ दिल हम भी अपना सोचते हैं
ज़रा सा सोचने वाले जहाँ जा
तुझे हम भी ज़रा सा सोचते हैं
मिलन पर सोचते रहते हैं क्या-क्या
बिछड़ते वक़्त हम क्या सोचते हैं
दिमाग़ इतना वहाँ किस काम का था
मोहब्बत में तो थोड़ा सोचते हैं
परों के बा'द अब ये ज़ेहन बाँधो
हम इस से आसमाँ का सोचते हैं
कफ़न की बात भी छिड़ ही गई थी
मरीज़ इक दिन में कितना सोचते हैं
ये जो घर छुट्टियों में भी न पहुँचे
ज़ियादा तो ये घर का सोचते हैं
किसी इक घोंसले को घर बताना
फ़क़त बच्चे ही ऐसा सोचते हैं
— Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'















