हाल-ए-दिल रोज़ सुनाता है कोई
रोज़ रोने चला आता है कोई
वो इशारे पे नचाए ऐसे
जैसे बन्दर को नचाता है कोई
हाथ आई को न यूँ जाने दो
किस को दावत पे बुलाता है कोई
कोई सूरत नज़र आती नहीं जब
आइने में नज़र आता है कोई
वो बिगड़ जाते हैं जो सुनते नहीं
अच्छा है मुझ को सुनाता है कोई
— Raushan miyaa'n















