कूचा-ए-इश्क़ में बदनाम हुई जाती है

ज़िंदगी दर्द का पैग़ाम हुई जाती है

मेरी आँखों से लहू बन के गिरे हैं मोती
बे-कली इश्क़ का अंजाम हुई जाती है

ज़िंदगी है मेरी इक यौम-ए-ग़रीबाँ जिस में
सुब्ह आई नहीं और शाम हुई जाती है

तेरी फ़ुर्क़त में मेरी ज़िंदगी जान-ए-जानाँ
मंज़िल-ए-मर्ग से दो-गाम हुई जाती है

अब कहाँ अब्र के पर्दे में क़मर रहता है
हुस्न की जल्वा-गरी आम हुई जाती है

ख़ंजर-ए-हिज्र से ऐ जान-ए-तमन्ना, दिल में
वो ख़लिश है कि जो आराम हुई जाती है

अब तो ये हाल है मेरा कि तेरी मह़फ़िल में
मेरी ख़ामोशी भी पैग़ाम हुई जाती है

— RIZWAN ALI RIZWAN

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