नज़्म- वर्ल्डवुड

कल रात मैं चाँद तारों से बात करता रहा
उस ने पूछा तकलीफ़ में हो पर मैं मुकरता रहा
थोड़ी देर ख़ामोशी से देखने के बा'द
उस ने कहा ज़माने के सताए लगते हो
बिन ख़ता किए सज़ा पाए लगते हो
बात ही बात में फिर मैं भी सब कुछ बोल बैठा
दिल के हर परत को उस के सम्मुख खोल बैठा
मैं ने कहा मैं ज़माने की अदाकारी का मारा हूँ
अपनों में भी अपनों को पहचान न पा रहा हूँ
होंठों पर मुस्कान दिल में कुछ और ही रखते हैं सब
कहते कुछ और करते कुछ और हैं सब
चाँद ने मुस्कुरा कर बड़ी शालीनता से जवाब दिया
तुम कुछ सालों से हो इस 'वर्ल्डवुड' में
मैं सदियों से ये अदाकारी देख रहा हूँ
एक दूसरे के ख़िलाफ़ सबकी मक्कारी देख रहा हूँ
यहाँ ऐसे ही होता है ये सब से बड़ा रंगमंच है
यहाँ होता हर किसी के साथ रोज़ प्रपंच है
जो इस रंगमंच की कला में माहिर होता है
उस का नाम ही ब्रह्मांड में जगजाहिर होता है

— RAJAT KANAUJIYA RAJAT

More by RAJAT KANAUJIYA RAJAT

Other nazm from the same pen

See all from RAJAT KANAUJIYA RAJAT →

Raat Shayari

Shers of raat.

All Raat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling