
न जगने का समय तय है न तय है वक़्त सोने का
न पाने की मसर्रत है न कोई रंज खोने का
न ख़्वाहिश है न मक़सद है न कोई फ़िक्र मंज़िल की
मुझे है शौक़ शायद दोस्तों ख़ुद को डुबोने का
— Rohit Asthana Prabhav
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