ग़मों पे प्यार लाना चाहता हूँ
सुख़न से दिल लगाना चाहता हूँ
निकल आया हूँ घर से इस लिए मैं
दिलों में घर बनाना चाहता हूँ
मुहब्बत ही रहे हर दिल में ज़िंदा
मैं नफ़रत को मिटाना चाहता हूँ
जहाँ अपने खड़े हों सामने पर
मैं ख़ुद को ही हराना चाहता हूँ
मिरी कश्ती मिरी पतवार जर्जर
मैं दरिया पार जाना चाहता हूँ
वहाँ इक शख़्स रहता आइने में
मुझे उस से मिलाना चाहता हूँ
— Rupesh Rahi















