हम जो अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ते जा रहे हैं

जो अहम थे दोस्त वो सब पीछे छूटे जा रहे हैं

ज़िंदगी के फ़लसफ़े में इस कदर उलझे हुए हैं
ज़िंदगी जीनी भी है हम ये ही भूले जा रहे हैं

पूछते हो तुम मेरे मज़बूत होने का सबब
दर्द जितने भी मिले हैं हम तो सहते जा रहे हैं

कुछ ज़रूरी वस्तुओं को बस इकट्ठा करते-करते
जो सजाए थे कभी वो ख़्वाब बिखरे जा रहे हैं

कर नहीं पाए जिन्हें हम वक़्त के रहते किसी से
है वही सब बात ये जो हम तो लिखते जा रहे हैं

कर दिया था कुछ ग़लत हम ने किसी के साथ राही
है नहीं कुछ हाथ में सो हाथ मलते जा रहे हैं

— Rupesh Rahi

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