मर्तबा ख़ास कुछ मिला ही नहीं
जेब में वज़्न क्यूँकि था ही नहीं
पा तो लेता ज़रूर दौलत भी
मैं कि ख़ुद से ज़रा गिरा ही नहीं
राह मुश्किल थी इस लिए शायद
हम-सफ़र कोई भी हुआ ही नहीं
हम हैं तक़दीर के सताए हुए
कर के मेहनत भी कुछ मिला ही नहीं
प्यास बढ़ती गई है लोगों की
आँख में जल मगर बचा ही नहीं
साथ दे कोई या चला जाए
अब किसी से कोई गिला ही नहीं
— Rupesh Rahi















