मूकदर्शक आज जो जनता बनी है
ख़ामुशी है या कि समझो ख़ुद-कुशी है
सल्तनत बहरी हुई पर ये बताओ
आत्मा क्या आपकी भी मर चुकी है
ज़ुल्म करना या बचाना ज़ालिमों को
है नहीं ये वीरता ये बुज़दिली है
दौलतों के दम से है अब सब मुकम्मल
न्याय की ज़ंजीर ढीली हो चली है
देश के हालात ख़स्ता हों अगर तो
फिर क़लम लिक्खे बग़ावत लाज़िमी है
देख कर ये दुर्दशा अहल-ए-चमन की
ख़ूँ के आँसू रो रही माँ भारती है
— Rupesh Rahi















