ज़िंदगी सिर्फ़ इक कहानी है
मौत मंजिल है हक़-बयानी है
ज़िंदगी भर किया जो हम ने है
मौत किरदार की बयानी है
यूँ न इतरा बदन पे अपने तू
चार दिन की ये बस जवानी है
यूँ कमाई नहीं ग़लत दौलत
क्योंकि इज़्ज़त हमें कमानी है
पैर मुझ को ज़मीं पे रखने हैं
मेरी मंज़िल प आसमानी है
कुछ तो करना है हम को दुनिया में
उम्र यूँ ही नहीं गँवानी है
एक दौलत है बस मुहब्बत की
और जो बारहा लुटानी है
— Rupesh Rahi















