है कोई और जो अंबर में है
साँवला चाँद मेरे घर में है
ख़त कबूतर से जो भिजवाया है
तब से ये जान कबूतर में है
जब भी मिलना हो पलट देता हूँ
हर मुलाक़ात कैलेंडर में है
साथ मैं दूँ तो भला किस का दूँ
हुस्न और इश्क़ बराबर में है
ग़म नहीं है कि मुयस्सर है ग़म
इक ख़ज़ाना तो मुक़द्दर में है
तू समय है न तेरा ओर न छोर
तू सदी में है तू पल-भर में है
— Saarthi Baidyanath















