गिर्द-ए-क़मर भरपूर अँधेरा
आँखें रौशन दूर अँधेरा
चश्म-ए-पुर-नम से डरता है
आँखों का नासूर अँधेरा
आलम के नक़्शे से पहले
ख़ुदस था रंजूर अँधेरा
तन्नूरों में पोशीदा है
जलता हुआ दैजूर अँधेरा
बस्ती बस्ती मारा मारा
फिरता है माज़ूर अँधेरा
— Safar
आँखें रौशन दूर अँधेरा
चश्म-ए-पुर-नम से डरता है
आँखों का नासूर अँधेरा
आलम के नक़्शे से पहले
ख़ुदस था रंजूर अँधेरा
तन्नूरों में पोशीदा है
जलता हुआ दैजूर अँधेरा
बस्ती बस्ती मारा मारा
फिरता है माज़ूर अँधेरा
Other ghazal from the same pen
Shers of andhera.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling