बंद दिल के तालों की चाबियाँ बनाऊँगा
इंतिज़ार करने को खिड़कियाँ बनाऊँगा
अब नहीं बनाऊँगा ज़ख़्म की दवा कोई
ताज़ा ही रहे ऐसी पट्टियाँ बनाऊँगा
तुम निभाते ही रहना सब रिवाज़ दुनिया के
पर मैं एक बेवा की चूड़ियाँ बनाऊँगा
हँसते मुस्कुराते इक चेहरे को बना कर मैं
रंग भरतीं उस
में कुछ तितलियाँ बनाऊँगा
लौट कर नहीं आए जंग पर गए थे जो
उन के बच्चों की ख़ातिर बस्तियाँ बनाऊँगा
तुम सभी बनाओ बस साज़िशे गिराने की
आने वालों की ख़ातिर सीढ़ियाँ बनाऊँगा
है उदास लोगों की ज़िम्मेदारी भी मुझ पर
ख़ुद कुशी मैं करने को पटरियाँ बनाऊँगा
— Sagar Sahab Badayuni















