ये क्या किया के अपना तमाशा बना लिया
कर्तब दिखाने आए थे क़िस्सा बना लिया
माना के कुछ नहीं हुआ हासिल कभी मुझे
तुम ने बिछड़ के मुझ से कहो क्या बना लिया
समझा रहा था देख के शीशे में ख़ुद को मैं
तू क्या था और कैसा ये चेहरा बना लिया
पहचान बन गया मिरी मेरा सुनाया दुख
अपने दुखों को अपना ही लहजा बना लिया
दो चार बूँद मिल गईं तो कूदने लगे
वो चुप रहे जिन्होंने था दरिया बना लिया
करता रहा मना मैं रहो दूर उस से तुम
तुम ने उसी के साथ में रिश्ता बना लिया
— Sagar Sahab Badayuni















