साथ चलते हैं ज़मानों की तरह होते हैं
यार तस्बीह के दानों की तरह होते हैं
वार किस सम्त से होगा मुझे मालूम नहीं
लोग शतरंज के ख़ानों की तरह होते हैं
रोग़न-ओ-रंग से मजबूत नहीं हो सकते
हम जो बोसीदा मकानों की तरह होते हैं
ऐन मुमकिन है हमें कोई कभी ढूँड ही ले
क़ीमती लोग ख़ज़ानों की तरह होते हैं
प्यार जितने भी करें नफ़्ल इबादत है 'सलीम'
इश्क़ बे-वक़्त अज़ानों की तरह होते हैं
— Saleem Nutkani















