इक बला ए हुस्न क्या क्या कर गई
बेरुखी करके जो तन्हा कर गई
कम मुहब्बत और ज़्यादा कर गई
भरते ज़ख़्मों को भी ताज़ा कर गई
फूल तितली ख़ास थे कितने कभी
इक नजर में सब को सादा कर गई
ख़्वाब में माशूका सी पेश आती थी
रूबरू वो ख़्वाब झूठा कर गई
इतना खारा है समुंदर सरफिरा
इसको छू कर कितना मीठा कर गई
कुछ कदम तो साथ लेकर भी चली
मोड़ पर आख़िर में चलता कर गई
हक जताती रह गई दुनिया "शफ़क़"
चूमकर वो तुझको जूठा कर गई
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