इक बला ए हुस्न क्या क्या कर गई

बेरुखी कर के जो तन्हा कर गई

कम मुहब्बत और ज़्यादा कर गई
भरते ज़ख़्मों को भी ताज़ा कर गई

फूल तितली ख़ास थे कितने कभी
इक नजर में सब को सादा कर गई

ख़्वाब में माशूका सी पेश आती थी
रूबरू वो ख़्वाब झूठा कर गई

इतना खारा है समुंदर सरफिरा
इस को छू कर कितना मीठा कर गई

कुछ कदम तो साथ ले कर भी चली
मोड़ पर आख़िर में चलता कर गई

हक जताती रह गई दुनिया "शफ़क़"
चूम कर वो तुझ को जूठा कर गई

— Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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