फिर वही क़िस्से कहानी कर रहे हो यार तुम

या'नी इक सहरा में पानी कर रहे हो यार तुम

थी मुहब्बत बादशाहों को कनीज़ों से मगर
उन कनीज़ों को ही रानी कर रहे हो यार तुम

ख़ूब बेचा है सियासत-दाँ ने मेरे मुल्क को
फिर हुकूमत ख़ानदानी कर रहे हो यार तुम

गुफ़्तगू करनी है मुझ को आज ये महताब से
रात मेरी कब सुहानी कर रहे हो यार तुम

वो ज़माना था अलग जब इश्क़ में मरते थे लोग
बात ये काफ़ी पुरानी कर रहे हो यार तुम

फ़र्क़ होता है बहुत इन की बुलंदी में ऐ दोस्त
जुगनू को तारे का सानी कर रहे हो यार तुम

शा'इरी करना अदब की बात है समझो 'शफ़क़'
शा'इरी में बद-ज़बानी कर रहे हो यार तुम

— Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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