जब-जब भी ये घाव मेरा हरा हुआ है
उसका छूना मानो जैसे दवा हुआ है
पंखे से लटका जिसने देखा उसको
आज तलक वो सहमा है डरा हुआ है
बाप की चिंता तब जानी है उसने जब
बेटा जैसे जैसे उसका बड़ा हुआ है
हार चुके हैं रावण के सब दरबारी
अंगद फिर भी सीना ताने खड़ा हुआ है
खून के रिश्ते भी धोखा दे जाते हैं
कौन यहाँ पे इक दूजे का सगा हुआ है
बाहरस तो सब के सब ही ज़िंदा हैं
अंदर से हर इंसा लेकिन मरा हुआ है
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