zindagi bhar mujhe is baat kii hasrat hi rahi | ज़िंदगी भर मुझे इस बात की हसरत ही रही

  - Saqi Amrohvi

ज़िंदगी भर मुझे इस बात की हसरत ही रही
दिन गुज़ारूँ तो कोई रात सुहानी आए

  - Saqi Amrohvi

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    ख़ुदा ने क्यूँ दिल-ए-दर्द-आश्ना दिया है मुझे
    इस आगही ने तो पागल बना दिया है मुझे

    तुम्ही को याद न करता तो और क्या करता
    तुम्हारे बा'द सभी ने भुला दिया है मुझे

    सऊबतों में सफ़र की कभी जो नींद आई
    मिरे बदन की थकन ने उठा दिया है मुझे

    मैं वो चराग़ हूँ जो आँधियों में रौशन था
    ख़ुद अपने घर की हवा ने बुझा दिया है मुझे

    बस एक तोहफ़ा-ए-इफ़्लास के सिवा 'साक़ी'
    मशक़्क़तों ने मिरी और क्या दिया है मुझे
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    Saqi Amrohvi
    तू नहीं तो तिरा ख़याल सही
    कोई तो हम-ख़याल है मेरा
    Saqi Amrohvi
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    ज़िन्दगी भर मैं सरगिरानी से
    ऐसे खेला हूँ जैसे पानी से

    कितने ही ग़म निखरने लगते हैं
    एक लम्हे की शादमानी से

    हर कहानी मिरी कहानी थी
    जी न बहला किसी कहानी से

    सिर्फ़ वक़्ती सुकून मिलता है
    प्यास बुझती नहीं है पानी से

    मुझ को क्या क्या न दुख मिले 'साक़ी'
    मेरे अपनों की मेहरबानी से
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    Saqi Amrohvi
    माज़ी भी है उदास मेरे हाल की तरह
    ये साल भी गुज़र गया हर साल की तरह
    Saqi Amrohvi
    मैं तुझको भूल जाऊँ मगर मसअला ये है
    कैसे कटेगी उम्र तेरी याद के बग़ैर
    Saqi Amrohvi
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