bhar jaayenge jab zakhm to aaunga dobara | भर जाएँगे जब ज़ख़्म तो आऊँगा दोबारा

  - Sarvat husain

भर जाएँगे जब ज़ख़्म तो आऊँगा दोबारा
मैं हार गया जंग मगर दिल नहीं हारा

  - Sarvat husain

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    जाने उसने क्या देखा शहर के मनारे में
    फिर से हो गया शामिल ज़िन्दगी के धारे में

    इस्म भूल बैठे हम जिस्म भूल बैठे हम
    वो हमें मिली यारो रात इक सितारे में

    अपने अपने घर जा कर सुख की नींद सो जाएँ
    तू नहीं ख़सारे में मैं नहीं ख़सारे में

    मैंने दस बरस पहले जिस का नाम रक्खा था
    काम कर रही होगी जाने किस इदारे में

    मौत के दरिंदे में इक कशिश तो है 'सरवत'
    लोग कुछ भी कहते हों ख़ुद-कुशी के बारे में
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    Sarvat husain
    मिट्टी पे नुमूदार हैं पानी के ज़ख़ीरे
    इन में कोई औरत से ज़ियादा नहीं गहरा
    Sarvat husain
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    वहीं पर मिरा सीम-तन भी तो है
    उसी रास्ते में वतन भी तो है

    बुझी रूह की प्यास लेकिन सख़ी
    मिरे साथ मेरा बदन भी तो है

    नहीं शाम-ए-तीरा से मायूस मैं
    बयाबाँ के पीछे चमन भी तो है

    मशक़्क़त भरे दिन के आख़ीर पर
    सितारों भरी अंजुमन भी तो है

    महकती दहकती लहकती हुई
    ये तन्हाई बाग़-ए-अदन भी तो है
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    Sarvat husain
    कभी तेग़-ए-तेज़ सुपुर्द की कभी तोहफ़ा-ए-गुल-ए-तर दिया
    किसी शाह-ज़ादी के इश्क़ ने मेरा दिल सितारों से भर दिया

    ये जो रौशनी है कलाम में कि बरस रही है तमाम में
    मुझे सब्र ने ये समर दिया मुझे ज़ब्त ने ये हुनर दिया

    ज़मीं छोड़ कर नहीं जाऊँगा नया शहर एक बसाऊँगा
    मेरे बख़्त ने मेरे अहद ने मुझे इख़्तियार अगर दिया

    किसी ज़ख़्म-ए-ताज़ा की चाह में कहीं भूल बैठूँ न राह में
    किसी नौजवाँ की निगाह ने जो पयाम वक़्त-ए-सहर दिया

    मेरे साथ बूद-ओ-नबूद में जो धड़क रहा है वजूद में
    इसी दिल ने एक जहान का मुझे रू-शनास तो कर दिया
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    Sarvat husain
    जिसे अंजाम तुम समझती हो
    इब्तिदा है किसी कहानी की
    Sarvat husain

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