कितना अच्छा होता अपना काम करते
नौकरी में क्या ही हम आराम करते
धूप जब हम को बहुत तड़पाती जानम
तेरी पलकों के तले हम शाम करते
दिल से जीता था ख़रीदा तो नहीं था
तो तुम्हें किस शर्त पे नीलाम करते
उस को रुख़्सत कर दिया मैं ने ख़ुशी से
और क्या ही उस को हम इन'आम करते
शुक्र है अल्लाह का जो आ गया सब्र
वरना इक दिन तर्क हम इस्लाम करते
— Sayeed Khan















