जो ऐश में दौलत ये ज़ाया' होती है
भगवान की ही सब ये माया होती है
बेटी नहीं बन सकती है बेटा कभी
बेटी तो आख़िर धन पराया होती है
औलाद बस तब तक ही रहती है सगी
माँ-बाप की जब तक भी छाया होती है
अपने ही बच्चे जो न पाले ठीक से
औरों के घर की अच्छी आया होती है
तन और मन जलता है तब तक धूप से
जब तक न उस की ज़ुल्फ़ साया होती है
— Sahil Verma















