" तुम मुझे गले नहीं लगातीं "
मेरी बाहें राह देख थक जातीं
तुम्हारे सितम पर मुझ को
हैरानियाँ तक नहीं आतीं
और मैं तुम्हारे ख़्वाबों को
नैनों से बहती धारों को
इन होंठों की मुस्कानों को
झुमके वाले कानों को
तुम्हारे उन सभी राज़ों को
अपने अनकहे वादों को
कुछ मज़बूत इरादों को
तुम्हारी चश्मदीद निगाहों को
तुम्हारी कड़वी-मीठी बातों को
तुम्हारे बँधे हुए बालों को
साँवले ख़ूब-सूरत हाथों को
खिलखिलाते तुम्हारे दाँतों को
तुम्हारे संग बिताई यादों को
कब से बाहों में भर चुका हूँ
दिल-लगी से तुम्हारी तर चुका हूँ
तुम इक यही रस्म क्यूँ नहीं निभातीं
आख़िर तुम मुझे गले क्यूँ नहीं लगातीं
— Sahil Verma















