नाम से अब मिरे महफ़िल भी सजाने वो लगाफिर भरी महफ़िलों में नज़रें चुराने वो लगाछोड़ के आज मुझे ग़म के घराने में वोअपना अहबाब किसी और को बनाने वो लगा— Saba Rao