yuñ mujhe teri sadaa apni taraf kheenchti hai | यूँँ मुझे तेरी सदा अपनी तरफ़ खींचती है

  - Shahid Zaki

यूँँ मुझे तेरी सदा अपनी तरफ़ खींचती है
जैसे ख़ुशबू को हवा अपनी तरफ़ खींचती है

ये मुझे नींद में चलने की जो बीमारी है
मुझ को इक ख़्वाब-सरा अपनी तरफ़ खींचती है

मुझे दरिया से नहीं है कोई लेना-देना
क्यूँँ मुझे मौज-ए-बला अपनी तरफ़ खींचती है

खींचती है मुझे रह रह के मोहब्बत उस की
जैसे फ़ानी को फ़ना अपनी तरफ़ खींचती है

मैं हूँ सूरज सा रवाँ रात की जानिब 'शाहिद'
मुझ बरहना को क़बा अपनी तरफ़ खींचती है

  - Shahid Zaki

Sooraj Shayari

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