jidhar bhi dekhiye ik raasta banaa hua hai | जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है

  - Shahid Zaki

जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है
सफ़र हमारे लिए मसअला बना हुआ है

मैं सर-ब-सज्दा सकूँ में नहीं सफ़र में हूँ
जबीं पे दाग़ नहीं आबला बना हुआ है

मैं क्या करूँँ मिरा गोशा-नशीन होना भी
पड़ोसियों के लिए वाक़िआ बना हुआ है

मगर मैं 'इश्क़ में परहेज़ से बंधा हुआ हूँ
तिरा वजूद तो ख़ुश-ज़ाएक़ा बना हुआ है

बुरीदा शाख़ें हैं या शम्'अ-हा-ए-गुल-शुदा हैं
ख़मीदा पेड़ है या मक़बरा बना हुआ है

मिरे गुनह दर-ओ-दीवार से झलक रहे हैं
मकान मेरे लिए आईना बना हुआ है

शुऊरी कोशिशें मंज़र बिगाड़ देती हैं
वही भला है जो बे-साख़्ता बना हुआ है

किसी दुआ के लिए हाथ उठे हुए 'शाहिद'
किसी दिए के लिए ताक़चा बना हुआ है

  - Shahid Zaki

Nazara Shayari

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