bas rooh sach hai baaki kahaanii fareb hai | बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है

  - Shahid Zaki

बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है
जो कुछ भी है ज़मीनी ज़मानी फ़रेब है

रंग अपने अपने वक़्त पे खुलते हैं आँख पर
अव्वल फ़रेब है कोई सानी फ़रेब है

सौदागरान-ए-शोलगी-ए-शर के दोश पर
मुश्कीज़-गाँ से झाँकता पानी फ़रेब है

इस घूमती ज़मीं पे दोबारा मिलेंगे हम
हिजरत फ़रार नक़्ल-ए-मकानी फ़रेब है

दरिया की अस्ल तैरती लाशों से पोछिए
ठहराव एक चाल रवानी फ़रेब है

अब शाम हो गई है तो सूरज को रोइए
हम ने कहा न था कि जवानी फ़रेब है

बार-ए-दिगर समय से किसी का गुज़र नहीं
आइंदगाँ के हक़ में निशानी फ़रेब है

इल्म इक हिजाब और हवा से आइने का ज़ंग
निस्यान हक़ है याद-दहानी फ़रेब है

तज्सीम कर कि ख़्वाब की दुनिया है जावेदाँ
तस्लीम कर कि आलम-ए-फ़ानी फ़रेब है

'शाहिद' दारोग़-गोई-ए-गुलज़ार पर न जा
तितली से पूछ रंग-फ़िशानी फ़रेब है

  - Shahid Zaki

Diversity Shayari

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