माना कि ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं रही
इस बात पे हमें भी शिकायत नहीं रही
सोचा कि अब कहीं तो चले जाएँ मरने हम
इस बात की भी हम को इजाज़त नहीं रही
मैं रो ही देता तेरी क़सम मुस्कुराने पे
पर क्या करूँ जो दिल में वो क़ुर्बत नहीं रही
मैं बे-वफ़ा भी आप को कह देता जाँ मगर
इन नज़रों में वो आप की इज़्ज़त नहीं रही
पर्दा हया का तुम ने जभी जाँ हटाया था
औरत बनी मगर कभी औरत नहीं रही
— Sahir banarasi















