Sahir banarasi

Sahir banarasi

@sharmakaransharma94

Sahir banarasi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sahir banarasi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

बा'द में तुम को बताएँगे ग़म आज बस हम को तो पी लेने दो — Sahir banarasi
सोचता हूँ चूम लूँ उन हाथों को दुनिया में जो शा'इरी ज़िंदा रखें — Sahir banarasi
ग़म है उलझन है तन्हाई है इस सेे अच्छा तो मर ही जाते — Sahir banarasi
आओ होली खेले अब हम साँवरिया राधा रानी को भी तुम लेते आना — Sahir banarasi
इतना रिश्ता तो तेरा मेरा है 'साहिर' तुम रोते हो आँखें मेरी भर आती हैं — Sahir banarasi
कोहकन सा मर जाता बात सुन के तो 'साहिर' तुझ को क्यूँ ज़रूरत है फिर कोई जुदाई की — Sahir banarasi
तहय्युर भी न होते हैं अदा-ए-ज़िंदगी से हम फ़ना ही हो गए हैं अब ख़ुदा इस आशिक़ी से हम — Sahir banarasi
वा'दा करो मगर ये भी इक बार सोंच लो वा'दा न पूरा होने पे वो जान लेती है — Sahir banarasi
दिल से उस की सारी यादें भुला के बैठा इक लड़का सिगरेट सुलगा के — Sahir banarasi
हम भी इंसान अच्छे थे 'साहिर' शा'इरी ने हमें बिगाड़ा है — Sahir banarasi
इस तरफ़ लोग हैं उस ओर भी होंगे 'साहिर' देखो ये जंग में इंसान न मारा जाए — Sahir banarasi
रात हिज्र में गई तो दिन शराब में गया इश्क़ के ये रंग भी बड़े कमाल होते हैं — Sahir banarasi
चाँद सा आया कोई ईद मुबारक हो गई उन सेे जो नज़रें मिली ईद मुबारक हो गई — Sahir banarasi
हम सेे अच्छा कौन इस जहान में है तुम कहो इक तिरी नज़र पे जाँ ये जान हम लुटाते हैं — Sahir banarasi
दुनिया वाले क्या ही जानें किसे मुहब्बत कहते हैं तुम ने जिस को दिल में रक्खा उसे मुहब्बत कहते हैं — Sahir banarasi
गले मिलो तो ये भी ध्यान रखना अब 'साहिर' हर इक से रस्म-ए-मुहब्बत नहीं निभाते हैं — Sahir banarasi
रगों में दौड़ता है खूँ की तरह हिंदुस्ताँ हर इक को मिलता नहीं ये नसीब अब साहिर — Sahir banarasi
ये कौन दिल पे दे रहा दस्तक ख़बर नहीं लगता है इस को अब भी मुहब्बत का डर नहीं — Sahir banarasi

Ghazal

है दुआ उन की अब सलामत में थी ज़बाँ बंद जो बग़ावत में जुर्म तेरा मगर सज़ा हम को ऐसा होता तिरी अदालत में छोड़ क्यूँ तुम चले गए मुझ को थी कमी क्या मिरी इबादत में देखते अब न वो हमें मुड़ के कौन है करता ऐसा रुख़्सत में काटते दिन है आज कल ऐसे ग़ज़लें पढ़ते हुए यूँँ फ़ुर्क़त में अब मुहब्बत से दूर रहते हैं हीर राँझा हैं मिलते जन्नत में मुल्क की बात अब नहीं होती ये बुरा हो गया सियासत में लोग खाते है काट इंसाँ को ऐसा मुमकिन था इतनी वहशत में फेंकते हैं ये लोग अब पत्थर जीना दूभर है ऐसी दहशत में छोड़ हम कैसे देते सिगरेट को है ये तोहफ़ा मिला मुहब्बत में राम पैदा जहाँ हुए 'साहिर' है मिली वो ज़मीं विरासत में — Sahir banarasi