ये कौन आके बैठा है बीमार शक्ल में
कुछ मुझ सेा दिखता है ये ख़रीदार शक्ल में
आख़िर तो एक रोज़ मुलाक़ात होगी फिर
कब तक छुपेगा अब तू ये बेज़ार शक्ल में
ये किस जहान में ख़ुदा ने हम को फेंका है
मुझ सेा न कोई है निगह-ए-यार शक्ल में
किस को सुनाऍं दिल में हैं क्या क्या दबाए हम
सब बैठे हैं यहाँ पे गुनहगार शक्ल में
गर ज़िंदगी में मिल गए तो हम से पूछना
क्या है छुपा वो गेसू-ए-दिलदार शक्ल में
— Sahir banarasi















