मिरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता था

वो चाहता तो मिरे साथ चल भी सकता था

ये तू ने ठीक किया अपना हाथ खींच लिया
मिरे लबों से तिरा हाथ जल भी सकता था

उड़ाती रहती है दुनिया ग़लत-सलत बातें
वो संग-दिल था तो इक दिन पिघल भी सकता था

उतर गया तिरा ग़म रूह की फ़ज़ाओं में
रगों में होता तो आँखों से ढल भी सकता था

मैं ठीक वक़्त पे ख़ामोश हो गया वर्ना
मिरे रफ़ीक़ों का लहजा बदल भी सकता था

अना को धूप में रहना पसंद था वर्ना
तिरे ग़ुरूर का सूरज तो ढल भी सकता था

रगड़ सकी न मिरी प्यास एड़ियाँ वर्ना
हर एक ज़र्रे से चश्मा उबल भी सकता था

पसंद आई न टूटी हुई फ़सील की राह
मैं शहर-ए-तन की घुटन से निकल भी सकता था

वो लम्हा जिस ने मुझे रेज़ा-रेज़ा कर डाला
किसी के बस में जो होता तो टल भी सकता था

— Shayar Jamali

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