एक क़तरे के लिए दिन रात दरिया सोचनाहम को पागल कर न दे हद से ज़ियादा सोचनादेखिए कब तक ये दोहरी ज़िन्दगी हम जी सकेंभीड़ के हमराह चलना और तन्हा सोचना— Shayar Jamali