जिस्म से ये रूह जैसे जा रही है
शहर को वो छोड़ कर के जा रही है
आज उस की आँख से आँसू गिरा था
वो मगर हम से छुपाए जा रही है
कौन मेरी प्यास को अब कम करेगा
बारिशें वो साथ ले के जा रही है
राख इतनी उड़ रही है आसमाँ में
वो खतों को आग दे के जा रही है
मैं 'अभय' की हूँ उसी की ही रहूँगी
भेज कर क़ासिद बता के जा रही है
— Abhay Mishra















