अच्छा नईं था जो हुआ था वाक़िया कल
रोका नईं मेरा किसी ने रास्ता कल
आख़िरी ख़त उस का देकर मुझ को मेरे
सामने ही रो पड़ा था डाकिया कल
साथ उस के और कोई भी था मैं ने
एक अरसे बा'द उस को देखा था कल
तेरे ग़म ने मुझ को पागल कर दिया है
भूल बैठा था मैं घर का रास्ता कल
किस तरह गुज़रेगा दिन कल का मेरे दोस्त
होने वाला है नया इक हादसा कल
— karan singh rajput















