ख़ौफ़ इतना था भरा उन आँधियों में
पाँव पड़ते ही नहीं थे बस्तियों में
कौन हाल-ए-ज़ार कब तक याद रक्खे
दुख भी हम को था मिला इन सर्दियों में
आप लोगों में सुकून-ए-दिल कहाँ था
वो सुकून-ए-दिल मिला था तितलियों में
और उस को कोई पर्वा भी नहीं अब
मुतमइन हो कर खड़ा है खिड़कियों में
— Shivam Raahi Badayuni















