पर्दा आँखों से उठा के देखता हूँ
ज़िंदगी हाथों से जाते देखता हूँ
दुनिया-ए-इबलीसी के मैं कारना
में
आधे सुनता और आधे देखता हूँ
मज़हब-ओ-मिल्लत की दौड़-ओ-आड़ में मैं
हो रहे हैं जो तमाशे देखता हूँ
सुनता है अज़ ख़ुद ख़ुदा हर एक दिल की
क्यूँ मैं इस को आज़मा के देखता हूँ
मतलबी दुनिया में हाजतमंद को मैं
कौन देता है दिलासे देखता हूँ
— Simar Gozra















