मुझ को हर ख़ौफ़ से रिहा कर दो

या तो फिर शाख़ से हरा कर दो

रोज़ उस की ही याद आती है
कुछ नया तुम ही हादसा कर दो

ज़ख़्म सबके ख़रीद लूँगी मैं
गर उसे मेरा हमनवा कर दो

ऐसे क़ातिल को क्या कहेंगे हम
जाने दो उस को तुम रिहा कर दो

गाहे गाहे मैं मुस्कुराती हूँ
मुझ को हर पल का ग़म-ज़दा कर दो

— Sristi Singh

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