क्यूँँ लगाऊँ जाँ की बाज़ी दिल के कारोबार में?
बिक रही है जब मोहब्बत इश्क़ के बाज़ार में
हारनी थी जंग मुझ को जीतना मुझ को न था
वर्ना इतना दम नहीं था उस सिपहसालार में
लाख चाहूँ मैं छुपाना पर छुपा पाता नहीं
ज़िक्र उस का आ ही जाता है मिरे अश'आर में
— Shashank Shekhar Pathak















