आया हूँ ज़रा देर को दुनिया से निकल कर
आ देख मुझे बज़्म-ए-तमाशा से निकल कर
ऐ हम-नफ़सो और कोई ईसा-नफ़स है
जाती है शिफ़ा दस्त-ए-मसीहा से निकल कर
ये ख़्वाब कहीं मुझ को समुंदर में न ले जाए
दरिया ही में गिर जाता हूँ दरिया से निकल कर
हर इश्क़ की पहचान हुआ करती है अपनी
क्या क़ैस रहेगा कोई सहरा से निकल कर
— Tariq Naeem















