“दरवाज़ा”

देखो तो रिश्ता बन जाता है
कमरे से
दीवारों से
छत से
खिड़कियों से
मेरा भी था इन सब से ही
लेकिन
जाने क्यूँ आज मुझे उस दरवाज़े की याद में बेचैनी सी होती है
जिस ने जाते हुए सब से आख़िर में
और आते हुए सब से पहले
मेरे क़दमों को सुना है
जिस से मेरा अंदर बाहर होता रहना चलता रहता था
उस दिन तक
जिस दिन तक
वो घर घर था

उस दरवाज़े ने मेरे बचपन को जाते हुए
और जवानी को आते हुए देखा है

उस शहर से तो नाते के लगभग सारे डोर ही टूट चुके हैं
आज वो घर भी बिक गया है

— Ananth Faani

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