“इश्क़”

हद से जब ये बढ़ जाता है
इश्क़ इबादत बन जाता है

अच्छा लगता है जब कोई
शहर-ए-रूह में बस जाता है

याद नहीं फिर जाती उस की
नस नस में जो रम जाता है

रोज़ नए ख़्वाबों को देकर
आँखें सूनी कर जाता है

ये लबरेज़ करे है दिल को
फिर ये तन्हा कर जाता है

रास नहीं आती तन्हाई
बन्दा पागल बन जाता है

अच्छा होता इश्क़ न करना
इश्क़ करें जो मर जाता है
इश्क़ करें जो मर जाता है

— Salma Malik

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