याद में उस की मर रहा हूँ मैं
खोने से उस को डर रहा हूँ मैं
वो गली में कहीं भी दिख जाए
धीरे-धीरे गुज़र रहा हूँ मैं
जाने क्या बात हो गई यारों
उस के मन से उतर रहा हूँ मैं
आज तक भूल ही नहीं पाया
जाने क्या यार कर रहा हूँ मैं
ज़ख़्म दे कर चला गया इक शख़्स
इक वही ज़ख़्म भर रहा हूँ मैं
अब जो पहचानता नहीं मुझ को
उस सितमगर के घर रहा हूँ मैं
— Vaseem 'Haidar'















