कई यूँँ ख़त लिखे उस ने
कई यूँ ख़त लिखे उस ने
कहा है इश्क़ करती हूँ
ज़रा सी दो जगह दिल में
कहा है इश्क़ करती हूँ
ज़मीं से दूर होते तुम
गगन में चांदनी होती
अगर जो दीप होते तुम
बनी मैं आरती होती
न मानो या न तुम मानो
न जानो या न तुम जानो
किया है प्यार इक तुम से
लगा दिल यार इक तुम से
बता देना मुझे जो भी
मिरी तुम ज़िंदगी जो हो
बनी हूँ मैं तिरी जोगन
मिरी तुम बंदगी जो हो
— Vinod Ganeshpure















