तिरे ग़ुरूर मिरे ज़ब्त का सवाल रहा बिखर बिखर के तुझे चाहना कमाल रहावहीं पे डूबना आराम से हुआ मुमकिनजहाँ पे मौज-ओ-सफ़ीने में ए'तिदाल रहानहीं कि शाम ढले तुम न लौटते लेकिनतुम्हारी राह में सूरज ही ला-ज़वाल रहाफिर अपना हाथ कलेजे पे रख लिया हम नेफिर उस के पाँव की आहट का एहतिमाल रहा— Vijay Sharma