मैं ने सोचा जो भी हुआ ही नहीं
इस लिए अब मैं सोचता ही नहीं
ध्यान तेरा जहाँ गया ही नहीं
कोई मंज़र वहाँ बना ही नहीं
ज़िंदगी भर मैं शे'र कहता रहा
तेरे ग़म का असर गया ही नहीं
जब से छोड़ा है उस ने तब से मैं
जाने वालों को रोकता ही नहीं
जिस की आँखों पे शे'र कहता हूँ
वो मेरी ओर देखता ही नहीं
साथ आती है उस के उस की बहन
अब मुलाक़ातों का मज़ा ही नहीं
— Viru Panwar Viyogi















