दिन गुज़रते ही नहीं फ़ासले घटते ही नहींहिज्र में वक़्त की रफ़्तार पे रोना आयाकोई दुख नम नहीं कर पाया मेरी आँखों कोमुझ को केवल तेरे इनकार पे रोना आया— Viru Panwar Viyogi