मंतर आँखों से पढ़ गई जानाँ
बै-पिए मुझ को चढ़ गई जानाँ
हाल अपना भी क़ैस जैसा है
अब तो दाढ़ी भी बढ़ गई जानाँ
दिल का रस्ता तुझे दिखाया था
तू तो माथे पे चढ़ गई जानाँ
जुर्म कर के तू अपनी आँखों से
दिल पे इल्ज़ाम मढ़ गई जानाँ
जब नज़र से नज़र मिली 'साहिल'
दिल के सब राज़ पढ़ गई जानाँ
— Wajid Husain Sahil















