हाल-ए-दिल की किताब बनता है
जब कोई हम-रिकाब बनता है
जिस की सीरत उतरती है दिल में
फिर वही इंतिख़ाब बनता है
वो शब-ओ-रोज़ ख़्वाब में आ कर
मेरी उल्फ़त का बाब बनता है
उस की यादों में मुंहमिक हो कर
दिल ये ख़ाना-ख़राब बनता है
ख़ूबसूरत है वो बहुत लेकिन
हुस्न इक दिन तुराब बनता है
'इश्क़ में है मिला वुफ़ूर-ए-ग़म
इस से अब इज्तिनाब बनता है
ज़ीस्त गर वस्ल से रहे महरूम
तो हर इक पल अज़ाब बनता है
तू ने वादे किए हैं उल्फ़त के
मेरा तुझ से हिसाब बनता है
दीद-ए-'रहबर' कभी जो हो जाए
रुख़ मिरा माहताब बनता है
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