Muhammad Asif Ali

Muhammad Asif Ali

@authorasifkhan

Muhammad Asif Ali shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Muhammad Asif Ali's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

नज़ाकत से नज़ाकत को हरा सकते नहीं हैं दिखावट भी दिखावे से दिखानी चाहिए थी — Muhammad Asif Ali
यूँँ मोहब्बत में निखरता है कहाँ दीवाना शख़्स हर कोई वफ़ा पाकर बिखर जाता है — Muhammad Asif Ali
तुम आवाज़ हो मेरी इक संसार हो मेरा मैं भटका परिंदा हूँ तुम हंजार हो मेरा — Muhammad Asif Ali

Ghazal

वफ़ा का बिल चुकाना भी नहीं आता ख़फ़ा से दिल लगाना भी नहीं आता दिया था घाव तू ने ख़ास जिस दिल पर निशाँ उस का दिखाना भी नहीं आता मकाँ अच्छा नहीं था पर बना मेरा ज़माने को भगाना भी नहीं आता मिला कैसे तुझे हर फ़न बता मुझ को मुझ सेे सुनना सुनाना भी नहीं आता ज़मीं पर बैठ कर अच्छा हँसाते थे मगर अब ग़म उठाना भी नहीं आता बदलते आज की ख़ातिर बदलते हम सदी में सन बढ़ाना भी नहीं आता जिसे तुम क़त्ल करने रोज़ जाते हो हमें उस को बचाना भी नहीं आता ख़िज़ाँ के ज़ख़्म भरते भी नहीं जल्दी हमें मरहम लगाना भी नहीं आता किसे हम को बचाना है बता दो तुम दवा सब को खिलाना भी नहीं आता किनारे पे समुंदर के रवाँ लहरें बिखरता दिल उठाना भी नहीं आता सदाएँ गूँजती आमान में तेरी हमें क़िस्सा सुनाना भी नहीं आता बता 'आसिफ़' हमारी शा'इरी का तुक लिखा मक़्ता' मिटाना भी नहीं आता — Muhammad Asif Ali
हिदायत के लिए मैं कुछ बताना चाहता हूँ सुन निज़ामत के लिए मैं कुछ सुनाना चाहता हूँ सुन पड़ेगी ख़ाक मुँह पर और दामन चीख़ जाएगा नज़ाकत के लिए मैं कुछ दिखाना चाहता हूँ सुन सज़ा दौर-ए-फ़लक की झेलना बस में नहीं तेरे ख़यानत के लिए मैं कुछ जताना चाहता हूँ सुन ज़मीं का रंज भी बर्बाद करना जानता है अब 'अदावत के लिए मैं कुछ दयाना चाहता हूँ सुन निशाँ यूँँ ज़ख़्म का दे दूँ भला कैसे तुझे मैं अब फ़ज़ाओं के लिए मैं कुछ ख़ज़ाना चाहता हूँ सुन सख़ावत भी दिखानी चाहिए 'आसिफ़' कभी तुझ को ज़माने के लिए मैं कुछ ज़माना चाहता हूँ सुन — Muhammad Asif Ali
किसी का ग़म उठाना हाँ चुनौती है किसी को अब हँसाना हाँ चुनौती है अड़ा है इस सज़ा के सामने सच भी मगर हरकत बताना हाँ चुनौती है तू ने बेची हज़ारों ज़िंदगी हो पर तुझे झूठा फँसाना हाँ चुनौती है सर-ए-बाज़ार तुझ को मैं झुकाऊँगा यहाँ तुझ को झुकाना हाँ चुनौती है नज़र से तो तेरी कोई बचा ही क्या यहाँ कुछ भी छिपाना हाँ चुनौती है अना तेरी यहाँ सब को सजा देगी तेरी आदत हटाना हाँ चुनौती है बता क्या क्या सभी को बोलना है अब वहाँ उन को बताना हाँ चुनौती है बुना है ख़ुद पिटारा साँप का उस ने नशा उस का मिटाना हाँ चुनौती है कि तेरे सामने 'आसिफ़' ज़माना है यहाँ उस को सताना हाँ चुनौती है — Muhammad Asif Ali

Nazm

"मैं मुसलमान हूँ" मैं एक फ़रमान हूँ तेरे लिए अहकाम हूँ तुझ से कैसे डरूँ तू बता मैं मुसलमान हूँ तेरी हसरत नहीं होगी पूरी तेरी तमन्ना रह जाएगी अधूरी मैं जोड़ता इस में ईमान हूँ मैं मुसलमान हूँ वहाँ पे तू बे-ज़बान होगा बुरा तेरा अंजाम होगा चार दिन की हुकूमत पे इतना नशा मैं तो सदियों से सुलतान हूँ मैं मुसलमान हूँ अपनी हरकत से किसी को न सता सच्चाई जा कर अपनी सब को बता बैठ कर कुर्सी पे क्यूँ इतराता है तू मैं तो दोनों जहाँ की जान हूँ मैं मुसलमान हूँ तेरी अच्छाई जंग खाने लगी तेरी बुराई शर्माने लगी आजा लग जा तू मेरे गले मैं तेरा ईमान हूँ मैं मुसलमान हूँ तू न होगा कभी कामयाब बताएगा अगर ख़ुद को साहब आजा तू भी उस की पनाह में जिस का मैं भी ग़ुलाम हूँ मैं मुसलमान हूँ तेरी सोच बिल्कुल छोटी है तेरे गुनाहों की पोटली मोटी है कर ले तू भी उस रब से तौबा जिस का मैं भी मेहमान हूँ मैं मुसलमान हूँ छोटों पर ज़ुल्म ढाता है तू बे-ईमानी की खाता है तू कर ले तू भी उस सेे मोहब्बत जिस के सदके मैं भी इंसान हूँ मैं मुसलमान हूँ — Muhammad Asif Ali